Jamsedpur
जमशेदपुर की सड़क पर हुआ हादसा सिर्फ चार लोगों की मौत की खबर नहीं है. यह उन चार घरों की जिंदगी भर की त्रासदी है, जहां आज दरवाजे पर निगाहें किसी अपने के लौटने का इंतजार कर रही होंगी. मगर वे कदम अब कभी उस दरवाजे तक नहीं पहुंचेंगे.
चार सांसें हमेशा के लिए थम गईं.
चार परिवारों की दुनिया उजड़ गई.
किसी मां की आंखों का सहारा चला गया, किसी पिता की उम्मीद टूट गई.
और हम शायद कुछ देर के लिए दुखी होंगे. हादसे की तस्वीरें देखेंगे, खबर पढ़ेंगे, सोशल मीडिया पर संवेदना जताएंगे और फिर अगले ही दिन उसी सड़क पर उसी जल्दबाजी, उसी लापरवाही और उसी बेपरवाही के साथ निकल पड़ेंगे.
आखिर कब तक?
सड़क दुर्घटनाएं अचानक नहीं होतीं. उनके पीछे अक्सर हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियां होती हैं तेज रफ्तार, हेलमेट की अनदेखी, सीट बेल्ट से दूरी, वाहन चलाते समय मोबाइल, गलत दिशा में गाड़ी चलाना और कुछ मिनट बचाने की वह बेचैनी, जो कभी-कभी पूरी जिंदगी छीन लेती है.
खासकर युवाओं को यह समझना होगा कि सड़क पर तेज होना जिंदगी में आगे होने की निशानी नहीं है.
एक्सीलेटर दबाना आसान है, लेकिन घर लौटने की जिम्मेदारी समझना जरूरी है.
जिस उम्र में सपने देखने चाहिए, उसी उम्र में कई परिवार अपने बेटों – बेटियों की तस्वीर के सामने आंसू बहाने को मजबूर हो जाते हैं. जिस बाइक पर बैठकर युवा अपने भविष्य की ओर बढ़ना चाहते हैं, वही बाइक एक क्षण की गलती में परिवार के भविष्य को अंधेरे में धकेल देती है.
एक सवाल हर घर से…
जब कोई युवा गाड़ी लेकर घर से निकलता है तो मां अक्सर कहती है धीरे जाना.
पिता कहते हैं सावधानी से जाना.
पत्नी कहती है “जल्दी मत करना.”
बच्चे शायद सिर्फ इतना चाहते हैं कि पापा शाम को वापस आ जाएं.
इन आवाजों की कीमत समझिए.
सड़क पर आपके पीछे सिर्फ एक वाहन नहीं चलता, आपके पीछे एक पूरा परिवार चलता है, उसकी उम्मीदें, उसके सपने और उसका इंतजार.
हादसे के बाद पुलिस जांच होगी. जिम्मेदारी तय होगी. रिपोर्ट बनेगी. खबर छपेगी. लेकिन किसी परिवार के घर का वह खाली कमरा कौन भरेगा? किसी मां की आंखों में वापस वही चमक कौन लाएगा? किसी पिता से उसके बच्चे की कमी कौन पूरी करेगा?
इन सवालों का जवाब किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं मिलेगा.
इसलिए जरूरत सिर्फ सड़क सुरक्षा अभियान चलाने की नहीं, सड़क पर अपनी मानसिकता बदलने की है.
हमें यह तय करना होगा कि मंजिल तक पहुंचने में पांच मिनट ज्यादा लग जाएं तो कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन किसी की जिंदगी पांच सेकंड की लापरवाही में खत्म नहीं होनी चाहिए.
रफ्तार पर नियंत्रण कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है.
सीट बेल्ट औपचारिकता नहीं, जिंदगी की डोर है.
और यातायात नियम पुलिस से बचने के लिए नहीं, जिंदगी बचाने के लिए हैं.
जमशेदपुर का यह हादसा चार परिवारों का दुख है, लेकिन इसे पूरे समाज की चेतावनी बनना चाहिए.
आज चार घरों में मातम है.
कल पांचवां घर किसका होगा, यह सवाल पूछने से पहले हमें अपनी रफ्तार पर सवाल उठाना होगा.
सड़क पर पहुंचने की जल्दी मत कीजिए.
क्योंकि जिंदगी कोई ऐसी मंजिल नहीं है, जहां देर से पहुंचने पर नुकसान हो जाए.
जिंदगी बची रही, तो मंजिलें हजार मिलेंगी.
लेकिन जिंदगी चली गई तो..
न सड़क बचेगी, न रफ्तार… सिर्फ एक परिवार का इंतजार बाकी रह जाएगा….


















